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सभी लोगों को मेरा नमस्कार। यह जो सवा सत्र है स्कॉच समिट का, इसकी एक—आपने तो जाना ही—एक हिस्ट्री है, लेकिन हिस्ट्री के पीछे भी हिस्ट्री है। अगर हम इसको सिर्फ 20 साल पीछे लेकर जाते हैं और उसके भी एक और 20 साल पीछे लेकर जाते हैं, तो हमें आयाम बदले हुए दिखते हैं।
अगर हम यह देखते हैं कि 1991 में जब लिबरलाइज़ेशन प्रोसेस शुरू हुआ, तो हमारा ऑब्जेक्टिव क्या था? लार्जली दो ऑब्जेक्टिव थे। एक था लाइसेंस और परमिट राज को खत्म करना ताकि गवर्नमेंट सर्विसेज़ सीमलेसली सभी को मिल पाए। दूसरा था स्पीडी और अनहिंडर्ड जन सर्विसेज़ ताकि हमें राशन की लाइन में या फिर केरोसिन की लाइन में या फिर टेलीफ़ोन की लाइन में खड़ा ना होना पड़े।
इसका सम-टोटल है एफिशिएंसी। अगर 1991 में हमने एफिशिएंसी की बात की और आज हम इस सवा सत्र में खड़े होकर उसी को मेज़र करने की कोशिश कर रहे हैं, तो एक बहुत बड़ी अचीवमेंट है। 50 साल लगते हैं किसी भी एक चीज़ को बदलने के लिए—हम उसको बोलते हैं वन जेनरेशन चेंज।
इसको भी हमने इन 100 समिट में अलग-अलग तरीक़े से—चाहे वह इंक्लूसिव ग्रोथ के नाम का हो या फिर बदलाव के नाम का—हमने उसको भी देखा। एक चीज़ उभर करके हमारे सामने आती है कि भारत देश बहुत सुंदर है—हमारे पास पहाड़ हैं, समुद्र है, नदियाँ हैं, जंगल हैं, प्लेन्स हैं—सब कुछ है।
अगर यह हमारी सुंदरता को बढ़ाता है, यही सबसे बड़ा हमारा डिसएडवांटेज भी बन जाता है क्योंकि हम एक-दूसरे से जुड़ नहीं पाते हैं। और सरकार का काम है सभी चीज़ों को जोड़कर एक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा करना—चाहे आप उत्तराखंड में हों, सिक्किम में हों, नागालैंड में हों या फिर केरल में हों—सीमलेस डिलीवरी, सीमलेस गवर्नेंस।
यही है कि कैसे यह एक वन नेशन, वन गवर्नमेंट जैसा बनता है। और अगर आज हम उसको मेज़र करने की कोशिश करते हैं तो शुरुआत उसकी वहीं से होती है कि जब हमने इन दो चीज़ों की नींव—कि किस तरीक़े से गवर्नमेंट सर्विसेज़ को इम्प्रूव किया जाए, टाइम कम किया जाए, एफिशिएंसी बढ़ाई जाए—तो इसकी नींव हमने रखी 2003 में, जब हमने गवर्नेंस को स्टडी करना शुरू किया।
एक बहुत बड़ा चैलेंज था उस वक़्त में कि देयर वर आइलैंड्स ऑफ़ सक्सेस—चैंपियंस थे—कोई यहाँ किया, कोई वहाँ किया, कोई यहाँ किया। पीछे हमारे पास कोई लर्निंग प्रोसेस नहीं था। हर एक चीज़ वाज़ बेस्ड ऑन इनोवेशन। इनोवेशन आज भी चल रही है।
तो गवर्नेंस के साथ में ई-गवर्नेंस को जोड़ा गया—उसका सम-टोटल हमने बोला गुड गवर्नेंस। क़रीबन 20–22 साल बीते। उसके साथ में टेक्नोलॉजी बदली—हमने आज उसको डिजिटल गवर्नेंस का नाम दिया, और आने वाले समय में शायद वह एआई गवर्नेंस होगी।
तो इसका मतलब यह हुआ कि जैसे श्रीनिवासन साहब ने कहा कि अगर पेपर ही पेपर था और उसको हैंडल करने के लिए अगर 100 लोग काम कर रहे थे और आज पेपरलेस हो गया है, लेकिन हमने मैनपावर कम नहीं की है—उसी मैनपावर को हमने दूसरे प्रोसेसेज़ में डाला है—so it is adding to our efficiency. That means to say the human resource has become even more productive, and combined with the technology interventions, it has changed the entire landscape.
हमने पिछले 20 साल में लगातार—एक के बाद एक—हर साल कंसिस्टेंटली गवर्नेंस को स्टडी किया। आज मैं आपको बता सकता हूँ कि 15,000 से ज़्यादा प्रोजेक्ट हमने स्टडी किए, डॉक्युमेंट किए; 4,00,000 घंटे से ज़्यादा हमने इस पर स्पेंड किया है; और अगर हम मैन-आवर्स की बात करेंगे तो वह 100 साल से ऊपर जाएगा।
तो अगर इतना काम देश में हुआ—सरकार के बाहर—स्कॉच is the only organization which has done consistently year-on-year study into the governance improvements in the country।
2014 का डेटा आपके सामने है। टॉप परफ़ॉर्मिंग स्टेट्स 2014 में गुजरात थी—वापस 2019 में लौट के आई और 2022 में भी लौट के आई। तो तीन बार गुजरात पिछले 10 साल में नंबर एक रहा। आंध्र प्रदेश दो बार रहा, तेलंगाना 2016 में, राजस्थान 2017 में।
इसका मतलब यह हुआ—जैसे कोचर साहब ने सुबह बोला था—कि हम नहीं देखते कि किसकी सरकार है; हम सिर्फ़ यह देखते हैं कि आउटकम-बेस्ड असेसमेंट में जनता को कहाँ पर उसका लाभ मिला। So our entire focus is on the citizen voice. We do not look at what has been done for them—प्रोसेस शायद बहुत मुश्किल रहा होगा—लेकिन वहाँ पर क्या बदला।
एक उदाहरण आपको देता हूँ। सिक्किम से लोग हैं यहाँ पे। टेमी में हम लोग थे और वहाँ पर सिटिजन फैसिलिटेशन सेंटर लगाया था NIC के देखरेख में। एक दिल्ली में भी था। दिल्ली में अगर पहुँचते हैं तो गाड़ी आपकी बिल्कुल उसके सामने तक जाती है—जैसे ड्राइव-इन रेस्टोरेंट होता है—आप अपनी सर्विस लेते हैं और निकल जाते हैं।
लेकिन टेमी में उस तक पहुँचने के लिए क़रीबन 20 मिनट की पहाड़ से नीचे उतरने की वॉक थी। सर्विसेज़ मिल रही थीं, लोग काम कर रहे थे और लोग ख़ुश भी थे। इसका मतलब यह हुआ कि हर जगह जियोग्राफिकल चैलेंज हैं—हम उनको कंपेयर नहीं करते कि सर्विस यहाँ भी मिल रही, वहाँ भी मिल रही तो क्या नया हुआ? नहीं—हम उस चीज़ को देखते हैं कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में वहाँ पर लोग काम कर रहे हैं और डिलीवर कर रहे हैं।
उत्तराखंड से लोग हैं, जम्मू से लोग हैं—क़रीबन 20 स्टेट से यहाँ पर लोग आज उपस्थित हैं। सब लोग इस चीज़ से रिलेट करेंगे कि जहाँ पर मुश्किलों में आप अपना प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंट करके, कंसिस्टेंटली ईयर-ऑन-ईयर सर्विसेज़ दे पा रहे हैं—उससे बड़ी बात और कोई नहीं हो सकती।
अगर मैं 2014 से 2024 तक की बात करूँ, तो हम स्टेट्स को तीन भागों में विभाजित करते हैं—पहले पाँच: हम उनको स्टार बोलते हैं; दूसरे में परफ़ॉर्मर; तीसरे में कैचिंग-अप।
पिछले 10 साल में गुजरात, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और ओडिशा यह रहे स्टार स्टेट्स में। परफ़ॉर्मर थे मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, यूपी और राजस्थान। कर्नाटक, हरियाणा, केरल, छत्तीसगढ़ और बिहार यह रहे कैचिंग-अप स्टेट्स में—यह था पिछले 10 साल का।
अगर इनकी आप क्यूम्यूलेटिव रैंकिंग देखें—इसको हमने पाँच-पाँच साल में विभाजित किया। अगर आप नीला देखते हैं तो 2014–19 को दर्शाता है; और अगर आप केसरिया/सफ़रन (यहाँ “सफ़न” कहा गया) देखते हैं तो वह आपको 2020–24 को दर्शाता है। लेकिन उसका सम-टोटल आप देखेंगे तो—यह उसकी स्कोरिंग—हमने सभी स्टेट्स को देखा, 34 स्टेट्स हमने स्टडी की।
कोई भी असेसमेंट हो, वह जाना जाता है अपनी रिसर्च मेथडोलॉजी के बेसिस पर। हम यह बोलते हैं कि जो हिंदुस्तान में यूनिवर्सिटीज़ हैं—वो ग्लोबल रैंकिंग में क्यों नहीं हैं? उसका क्या कारण हो सकता है? हम हार्वर्ड की बात करते हैं जब भी बात होती है; ऑक्सफोर्ड की बात करते हैं—हम हमेशा वेस्ट की तरफ़ देखते हैं कि उनका काम ज़्यादा अच्छा है। क्या इंटेलेक्ट वहाँ पर ज़्यादा पाया जाता है? The answer is no—इंटेलेक्ट शायद हमारे पास ज़्यादा हो, लेकिन हमारे पास कभी-कहीं प्रोसेस की कमी रही होगी कि हम अपनी उपलब्धियों को सही वक़्त पर डॉक्युमेंट नहीं कर पाए।
अगर हम वह कर पाते हैं, तो हमारे पास इंस्टीट्यूशनल फ़्रेमवर्क बनता है। मैं आपको बता सकता हूँ कि अगर आज की डेट में आप देखना चाहते हैं कि NIC ने 2003–04 में ई-गवर्नेंस को लेकर क्या काम किया—तो वह डॉक्युमेंटेशन हमारे पास है; वह शायद किसी और संस्था के पास नहीं होगी।
अगर 20 किताबें लिखी गई हैं तो उन 20 किताबों में भारत देश की जर्नी को साधा गया है, उसको लिखा गया है, उसको ध्यान में रखकर आगे किस तरीक़े से बेहतरी की जा सकती है, उसको डाला गया है। यह काम थिंक-टैंक्स का है; यह काम रिसर्च इंस्टीट्यूशंस का है; यह काम यूनिवर्सिटीज़ का है।
तो जो हमारे इंस्टिट्यूशन हैं—उनका शायद डॉक्युमेंटेशन या इंस्टीट्यूशनल कैप्चरिंग या इंस्टीट्यूशनल मेमोरी—वो शायद बहुत स्ट्रॉन्ग नहीं रहा। तो इसलिए हम बाहर की तरफ़ देखते हैं।
तो हमने उस गैप को फ़िल करने की कोशिश की—एक छोटा सा प्रयास है—कि जो हमने सब केस स्टडीज़ को तैयार किया, इनको पब्लिश किया, इनको पॉपुलर किया—और आज सब लोग आप हमारे साथ इकट्ठे हों।
इवैल्यूएशन प्रोसेस ही एक इस चीज़ को दर्शाता है कि आपने किस दौर से गुज़रकर उसको कितनी बारीकी से पढ़ा, देखा, परखा, समझा, और उसके बाद में आपने उसको कहा कि यह सराहनीय है।
तो देखते हैं—well-performing projects—जो हैं, स्टेट्स को इनवाइट करते हैं; वो सबमिट करते हैं। उसके बाद में पहला राउंड हम इंटरनली पढ़ते हैं—उसको देखते हैं कि यह इस पर और जानकारी लेने की आवश्यकता है या हम इसको as-is आगे ले जा सकते हैं।
उसके बाद में तीन एक्सपर्ट्स—जो कि स्कॉच से जुड़े हुए नहीं हैं, independent हैं—उनको आमंत्रित किया जाता है; आपसे बात करवाई जाती है; आप उनको प्रेज़ेंटेशन देते हैं और वह आपको असेस करते हैं।
पीयर्स की मार्किंग—आपके पियर्स भी उतने ही इम्पोर्टेंट हैं। आपने इस चीज़ को देखा होगा—जब आपने प्रेज़ेंटेशन दिया, तो हमने कहा कि आपके पियर्स भी पार्टिसिपेट करेंगे; उसमें वोटिंग पोल भी होता है; दूसरों से ओपिनियन भी लिया जाता है।
असेसमेंट सिर्फ़ एक मुद्दे पर है—क्या बदला? जनता के लिए क्या बदला? प्रोसेस जो भी आपने रखा हो। हम लोग फ़ील्ड रिसर्च भी करते हैं—जैसे मैंने कहा कि हमने इतने प्रोजेक्ट को फ़ील्ड-स्टडी किया, विज़िट किया—आंध्रा में किया, तेलंगाना में किया, केरल में किया, गोवा में किया, असम में किया—we had gone up to Shillong, far-flung area, जहाँ पर जनरली किसी का इंटरेस्ट नहीं होता जाने में—वहाँ से जाकर के हमने यह सब डॉक्युमेंट किया और brought to the discussion table।
तो सबसे बड़ा फ़ायदा इस चीज़ का क्या है? पॉलिसी-मेकिन्ग—एक तो आपको अपनी उपलब्धियों के बारे में एक दूसरे आयाम में मिलता है; कि दूसरे स्टेट्स में क्या चल रहा है; आपको कैसे उसको इम्प्रूव करना है; and then it becomes the sum-total—then it helps the state, it helps the national government.
Merit-list projects—जो हैं—उनको एग्ज़ीबिशन के लिए आमंत्रित किया जाता है; उस पर लाइव पोल होता है; और हर एक प्रोजेक्ट—जो है—उसको एक comprehensive स्कोर मिलने के बाद में ही कट-ऑफ़ डिसाइड होता है।
इतना comprehensive प्रोसेस—जो कि 6 महीने आपको लगातार एंगेज करता है—देश में किसी का नहीं है। आप एप्लिकेशन डालते हैं किसी और अवॉर्ड के लिए, असेसमेंट के लिए; उसके बाद भूल जाते हैं। फिर एक दिन चिट्ठी आती है—मिला या नहीं मिला—जाकर के ले लीजिए।
आप हमें एप्लिकेशन डालते हैं—उसके बाद में आपका हम जीना अराम कर देते हैं—आपको फ़ोन करके: आपको यहाँ पर आना है, वहाँ पर आना है, यह करना है, वह करना है। बहुत लोग तो कंप्लेंट भी करते हैं—अरे, आप लोग फ़ोन बहुत करते हैं। हमने—आपने—अब साँप के बिल में हाथ डाला तो काटेगा तो सही—और हम आपको छोड़ेंगे नहीं जब तक पूरा असेसमेंट नहीं कर लेंगे।
तो टॉप-रैंकिंग स्टेट—जैसे मैंने कहा कि तीन लेवल पर हम बोलते हैं। हमारी यह 39 कैटेगरी है—इसके बाहर देश में गवर्नेंस में कुछ नहीं है। यह सबका अमलगमेशन है—चाहे एग्रीकल्चर की बात करें, रेवेन्यू की बात करें, डिज़ास्टर मैनेजमेंट की बात करें—छोटी से छोटी से लेकर बड़ी चीज़—हमने उसको कवर किया।
अब आते हैं 2024 पर। 2024 में गवर्नेंस के आयाम फिर से बदले—महाराष्ट्र नंबर एक पर है, गुजरात नंबर दो पर है और आंध्र प्रदेश नंबर तीन पर है; यूपी नंबर चार और वेस्ट बंगाल नंबर पाँच।
इसमें भी तीनों हैं—अगर 2014–19 का स्कोर देखें तो नीले में cumulate स्कोर; 2020–24 का उसके ऊपर है; और बाक़ी जो येलो लाइन है—यह इस साल का—मतलब पिछले साल का—रिपोर्ट है—रिलीज़ अभी कर रहे हैं—तो उसका रैंक हमारा बनता है: महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, यूपी और वेस्ट बंगाल।
यहाँ पर आपको पिछले साल का कंपैरिजन दिखता है—2023 में महाराष्ट्र नंबर तीन पर था—छलांग मारकर एक पर आया—तीन की बढ़ोतरी की; गुजरात पाँच से तीन पर आया; आंध्र प्रदेश वही है जहाँ पर था—तो इसका मतलब है कि चाहे वहाँ पर सरकार बदली या ना बदली—गवर्नेंस remains consistent; यूपी नंबर जो है नीचे गिरा है; वेस्ट बंगाल जो है—इस वर्ष फिर से जंप मारकर ऊपर आया—सात से पाँच पर।
ऐसे ही परफ़ॉर्मर स्टेट्स हैं—कि किसकी रैंकिंग ऊपर है और किसकी नीचे। वैसे ही जो है कैचिंग-अप स्टेट्स। हम स्टेट्स—कोई नहीं—हम जितने हमारे 39 सेक्टर्स—हमने कैटेगरी आपको भी दिखाया—उन सभी का डेटा हमारे पास है; सभी ने उसमें पार्टिसिपेट किया।
उसमें अगर हम देखते हैं कि यह पाँच टॉप परफ़ॉर्मिंग सेक्टर्स हैं—जो कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नेंस, म्यूनिसिपल गवर्नेंस, पुलिस/सेफ्टी, पावर/एनर्जी और ट्रांसपोर्ट—जिनमें सबसे ज़्यादा बदलाव आया है।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नेंस में—फिर से महाराष्ट्र नंबर एक पर है; जम्मू-कश्मीर दो पर है; हिमाचल तीन; झारखंड चार; और छत्तीसगढ़ पाँच।
म्यूनिसिपल गवर्नेंस—महाराष्ट्र नंबर एक; हिमाचल दो; उत्तराखंड तीन; तमिलनाडु चार; और जम्मू-कश्मीर पाँच।
पुलिस एंड सेफ्टी—गुजरात नंबर एक; यूपी नंबर दो; उसके साथ वेस्ट बंगाल साथ में; हिमाचल प्रदेश चार नंबर पर; और राजस्थान पाँच पर।
सिमिलर्ली पावर/एनर्जी और ट्रांसपोर्ट। अगर यह देखेंगे—पाँच एरियाज़—इन पाँचों एरियाज़ का सिटिजन से कनेक्ट सबसे ज़्यादा होता है—चाहे वह डिस्ट्रिक्ट हो या म्यूनिसिपल लेवल पर हो—लॉ एंड ऑर्डर, पावर/बिजली—हर एक को चाहिए—और ट्रांसपोर्ट/मोबिलिटी के लिए।
तो इसलिए यह पाँचों सेक्टर उभर करके पिछले एक साल में आगे आए हैं। इसका मतलब है कि गवर्नेंस की प्रायोरिटी भी साथ-साथ चेंज होती है—इसका भी एक इंडिकेशन मिलता है हमें।
अब यह देखिए कि फोकस म्यूनिसिपल गवर्नेंस पर बड़ा है; पावर/एनर्जी पर बड़ा है; जनरल एडमिनिस्ट्रेशन, ट्रांसपोर्ट और एजुकेशन पर बड़ा है—यह वह फोकस है जिन पर एन्हांस फ़ोकस रहा पिछले साल में स्टेट गवर्नमेंट का।
जिन पर स्टेबिलिटी रही—ना नीचे गया, ना ऊपर गया—वह था रेवेन्यू, टूरिज़्म, इन्फ्रास्ट्रक्चर, हाउसिंग, कल्चर और हैंडलूम्स एंड टेक्सटाइल्स।
और जिन पर फ़ोकस थोड़ा कम हुआ स्टेट्स का—उसमें आया इरिगेशन, फिर जियोलॉजी एंड माइनिंग, डिज़ास्टर मैनेजमेंट, माइनॉरिटी अफ़ेयर्स और एनिमल हज़्बेंड्री एंड फ़िशरीज़।
तो यह था हमारा टॉप-लेवल व्यू—स्टेट ऑफ़ गवर्नेंस 2024। इसका डिटेल रिपोर्ट अभी आने वाले समय में हम रिलीज़ करेंगे—सबकी परफ़ॉर्मेंस को आँका गया—सभी सेक्टर्स को आँका गया। जो 39 सेक्टर्स हमने देखे—उन सभी का—सिर्फ़ हमने पाँच यहाँ पर प्रेज़ेंट किया है—उन सभी का डेटा हमारे पास है।
सवाल यह पैदा होता है कि इससे हमारा लर्निंग क्या है—what are the conclusions? जो एन्हांस फ़ोकस है या फिर जो नीचे गया है—वह हमें शायद लगता हो कि इस इम्पॉर्टेंस को जो कम मिल रही है वो किसी वजह से मिल रही होगी, लेकिन हो सकता है कुछ ऐसे सरकम्स्टैंसेज़ हों जिसकी वजह से उस पर फ़ोकस थोड़ा-सा कम हो गया—या जिस पर फ़ोकस बढ़ाया गया—शायद हमारे रडार पर ना हो as an administrator।
तो यह सारा डिटेल रिपोर्ट—जो है—as the next step—we will be publishing and we will be sharing it with you.
Thank you very much. जय हिन्द।