SKOCH Summit

The primary role of SKOCH Summit is to act as a bridge between felt needs and policy making. Most conferences act like echo-chambers with all plurality of view being locked out. At SKOCH, we have specialised into negotiating with different view-points and bringing them to a common minimum agenda based on felt needs at the ground. This socio-economic dimension is critical for any development dialogue and we happen to be the oldest and perhaps only platform fulfilling this role. It is important to base decisions on learning from existing and past policies, interventions and their outcomes as received by the citizens. Equally important is prioritising and deciding between essentials and nice to haves. This then creates space for improvement, review or even re-design. Primary research, evaluation by citizens as well as experts and garnering global expertise then become hallmark of every Summit that returns actionable recommendations and feed them into the ongoing process of policy making, planning and development priorities.

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A-222, Sushant Lok Phase I
Gurugram, Haryana
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Mr Rohan Kochhar at the 100th SKOCH Summit: Navigating New Frontiers in Economic Justice and Legal Frameworks

Mr Rohan Kochhar

Mr Rohan Kochhar

Founder, SKOCH Law Offices

  • The speaker frames the conversation around inspiring real-life journeys of UPSC success from disadvantaged backgrounds.
  • Bharat Singh’s story highlights resilience after eviction from a Civil Lines bungalow and a mother’s dream that her children would become officers.
  • Bharat faced severe adjustment challenges in an elite school environment—bullying, segregation of EWS students, and an English-language barrier—but persisted and assimilated over time.
  • His trajectory shows upward mobility through education (DTU), early career success (Tata Motors), and a deliberate risk in leaving a stable job to pursue IAS.
  • Anjali Sharma’s story emphasizes extraordinary mental strength after sudden blindness in Class 10 due to illness, followed by a return to school and academic excellence.
  • Anjali overcame lack of assistive-resource awareness by relying on listening-based learning and self-study, including YouTube, and succeeded despite repeated attempts and inconsistent scribes.
  • Satyam “Gandhi” demonstrates focused discipline after setbacks (including NDA disqualification due to color blindness), studying long hours under financial hardship and achieving a top rank.
  • Waseem Bhatt’s journey underscores the importance of family support, disciplined preparation (avoiding scattered guidance), strong note-making, and learning from failure after early success.
  • The keynote stresses that determination, consistency, and smart preparation habits (note-making, answer writing, focus) matter more than social background or initial setbacks.
  • On coaching, the speaker argues coaching is not essential for UPSC; selective use may help, but self-study resources are sufficient and often more efficient than expensive institutes.

* This content is AI generated. It is suggested to read the full transcript for any furthur clarity.

[संगीत] नमस्कार, वेलकम एंड जय हिंद। इस चैट विद रोहन के खास एपिसोड में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आज हमारे मेहमान श्री सज्जन सिंह यादव जी के बारे में मैं क्या ही बताऊं। जिस वर्ष में मैं पैदा हुआ उस वर्ष में ये यूपीएससी लिख रहे थे। इन्होंने एमबीए की, एमपीए की, पीएचडी की और अब देश के वित्तीय वातावरण को संभालते हैं। एडिशनल सेक्रेटरी डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर रेवेन्यू में हैं। इन्होंने किताब लिखी है प्रेरणा देने के लिए देश के युवाओं को। तो आज उस किताब से और कुछ सामाजिक जुड़े हुए सवाल हम सज्जन सिंह यादव जी से पूछेंगे।

सर, सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा, आपकी किताब जब मैं पढ़ रहा था, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरी आंखें भर आईं। आपको शायद ये पता नहीं होगा, मगर इस देश में कई ऐसे लोग हैं जो ऐसे वर्गों से आते हैं कि वो वो सुविधाएं जो हमें मिली, प्राप्त नहीं कर पाते आसानी से।

सन था 2001, दिसंबर का महीना था, दिल्ली की सर्दी में सिविल लाइंस के एक आलीशान बंगले में। कैसे टीकम सिंह, उनकी धर्मपत्नी उमा, 8 साल की बिटिया डॉली, 6 साल के बेटे भरत को पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों ने धक्के मार के बाहर निकाला। यह घर मिस्टर पी. वी. जयकृष्ण, दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी का था। यह लोग उनके सेवक थे। ठंड में ठिठुरती हुई, अपने बच्चों को जकड़ती हुई, एक मां के आंसुओं में लिपटी हुई, एक सिसकती हुई ख्वाहिश — एक दिन मेरे बच्चे भी अफसर बनेंगे। एक दिन हम भी बंगले में रहेंगे। कैसे पूरी की यादव जी? भरत सिंह ने अपनी मां की ख्वाहिश। थैंक यू। प्लीज।

थैंक यू। थैंक यू, रोहन। एंड फर्स्ट ऑफ ऑल, दिस हॉल हैज़ वैरी फन मेमोरीज़, क्योंकि यहीं पे मेरी पहली बुक जो थी, इंडिया’ज़ वैक्सीन ग्रोथ स्टोरी, वो ऑनरेबल फाइनेंस मिनिस्टर ने लॉन्च की थी। एंड आई एम वेरी प्रिविलेज्ड कि डॉ. एन. सी. सक्सेना सर यहां पे हैं। ही वाज़ अ डायरेक्टर ऑफ द एकेडमी। जब हम बच्चे थे और आईएएस में सेलेक्ट हो के नए-नए गए थे एकेडमी में, तो सर ने ही हमें सिखाया था। जो हम आज यहां तक पहुंचे हैं, तो सर का बहुत बड़ा रोल है।

और यह जो बहुत इंपॉर्टेंट स्टोरी, बहुत ही प्रेरणादायक मैं कहूंगा, स्टोरी ये बताई भरत सिंह की — और मैं एक चीज जोड़ूंगा इसमें मेरा एक पर्सनल टच भी है कि भरत सिंह जब उस घर से निकला, जो डिस्क्राइब किया आपने, तो फिर वह हमारे घर में ही आए। सो भरत इज़ सन ऑफ अ डोमेस्टिक हेल्प। वो जब — वो चीफ सेक्रेटरी रिटायर हो गए थे — तो जो सर्वेंट क्वार्टर होते हैं, बंगले के साथ अटैच्ड, उनमें ये रहता था। बच्चा छोटा था तब, भरत। और यह रूल है कि जब मेन बंगला खाली है, तो सर्वेंट क्वार्टर भी खाली करना पड़ेगा। तो उन्होंने बहुत रिक्वेस्ट की — उमा ने, टीकम ने — कि हमें रहने दिया जाए। नए चीफ सेक्रेटरी आने वाले हैं कुछ दिन में। पर ऑब्वियसली रूल का हवाला देकर नहीं सुना गया, और वह बच्चा फिर वहां से दूसरे सर्वेंट क्वार्टर में पहुंच गया, जो कि हमारे यहां पर था।

पर इसका बहुत ही रेज़िलियंस की स्टोरी है। बहुत डिटरमिनेशन की स्टोरी है उसकी, क्योंकि हर स्टेज पर संघर्ष था। पहले गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ा। फिर एक राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट आया, जिसमें कि बच्चों को कुछ जो एलीट स्कूल्स हैं, उसमें भी दरवाजे खुले गरीब बच्चों के लिए कि आप भी पढ़ सकते हैं। उसके तहत उसको संस्कृति स्कूल में — जहां की टीकम सिंह, उसके फादर, अभी भी पियोन है — वहां पे वो बच्चे का एडमिशन हुआ। खुशी की बात है। लेकिन बच्चे के लिए बहुत मुश्किल भी है एडजस्ट होना।

एक एलीट क्लास के बच्चे, जहां पर वह आईएएस, आईपीएस, मिनिस्टर्स, आर्मी ऑफिसर्स के बच्चे हैं, और एक यह बच्चा गवर्नमेंट स्कूल से, जिसको कि बालों में खूब सारा तेल लगा के, आंखों में काजल डाल के वहां भेजते थे स्कूल में बहुत खुश होके — वो बच्चा वहां जाकर बहुत प्रताड़ित होता था। उसको बिल्कुल अलग, वो तीन-चार ईडब्ल्यूएस के बच्चे, शुरू-शुर में अलग बैठते थे। उनको बहुत बुलिंग की जाती थी। बहुत उनका हरासमेंट भी होता था बच्चों से। नॉर्मल है।

और दूसरा बड़ा चैलेंज लैंग्वेज — हिंदी ही आती थी। सरकारी स्कूल में तो हिंदी में ही पढ़ते हैं। वहां तो हिंदी कोई बोलता नहीं है। इंस्ट्रक्शंस इंग्लिश में है। एग्ज़ामिनेशन इंग्लिश में है। ओरल एग्ज़ाम इंग्लिश में है। तो बच्चा कांपता था इंग्लिश का ओरल जिस दिन होता था, उससे पहले एक दिन कि मैं कैसे क्या बोलूंगा। लेकिन उस माहौल में एडजस्ट किया। बाकी ईडब्ल्यूएस के बच्चे चले गए। एक-एक करके छोड़कर चले गए। एडजस्ट नहीं कर पाए। यह बच्चा डटा रहा। इसने हिम्मत दिखाई और धीरे-धीरे एसिमिलेट हो गया। उसी में अब तो उसके वही बच्चे, जो उस समय बुलिंग करते थे, बहुत अच्छे दोस्त हैं। तो ये धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, क्लास नाइंथ तक आते-आते, तीन साल लगा और एसिमिलेट हो गया।

आगे बढ़ा। इंजीनियरिंग कॉलेज में गया। डीटीयू में एक अच्छा पड़ाव था। वहां पे बहुत मेहनत की। वहां उसको अच्छा लगा कि कोई डिस्क्रिमिनेशन नहीं है। किसी को नहीं पता मैं ईडब्ल्यूएस से हूं। किसी को नहीं पता मैं किसका बच्चा हूं। सब बराबर है। इंडिया को रिप्रेजेंट भी किया हांगकांग में कंपटीशन में।

लेकिन यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि यह जो पूरी जर्नी है — चाहे सक्सेस किसी फील्ड में हो, चाहे आईएएस बनने में हो, चाहे किसी और क्षेत्र में हो — आपको वह जो डिटरमिनेशन, मेहनत, लगन से लगना है।

तो, उसके बाद, कटिंग इट शॉर्ट — उसको आफ्टर डिग्री टाटा मोटर्स में जॉब मिल गई। और फैमिली के लिए बहुत बड़ा जंप है, उस फैमिली के लिए जो तब भी सर्वेंट क्वार्टर में ही रह रहे हैं। तब भी फैमिली की इनकम 20–25,000 ही है। उस स्टेज पे एक बच्चे को टाटा मोटर्स में असिस्टेंट मैनेजर मिल जाना और अच्छी सैलरी — उस समय 40–50,000 — एक बड़ा जंप है। लेकिन सैटिस्फाइड नहीं हुआ कि मेरा अभी आया नहीं है। सपना पूरा नहीं हुआ है। मेरा अभी बहुत बाकी है। जो मैं अचीव करना चाहता हूं, बहुत आगे जाना है। जो मैं अपनी फैमिली की फॉर्च्यून चेंज करना चाहता हूं। जो समाज में स्टेटस लाना चाहता हूं। जो मेरी मां का सपना था, या जो मैं बोलूंगा उस समय एक दुआ उठी थी जब सर्वेंट क्वार्टर से निकाला गया था कि एक दिन मेरे बच्चे भी ऑफिसर बनेंगे और मैं बंगले में रहूंगी। वो सपना पूरा करना था।

तो टाटा मोटर्स की नौकरी छोड़ दी। एक साल के बाद इतना बड़ा स्टेप लिया, इतना बड़ा रिस्क लिया, इतना बड़ा डिसीजन लिया। टाटा मोटर्स की नौकरी छोड़ के आईएएस की तैयारी की। और उतार-चढ़ाव के बाद उसमें भी बहुत अप्स एंड डाउंस आए। एक स्टेज ऐसी भी आई — फेल्योर के रहते — उसको लगा कि क्लर्क की नौकरी के लिए ही अप्लाई कर देता हूं। उसमें भी फॉर्म गलत भरा गया और एडमिट कार्ड नहीं आया। लेकिन उसकी किस्मत में लिखा था कि उसको बनना है। उसकी डिटरमिनेशन थी। उसका सपना था। उसका मेहनत थी। उसकी लगन थी, रिस्क था। फाइनली सक्सेसफुल हुआ। अभी वेस्ट बंगाल काडर में है। एसडीएम आजकल। जी।

बहुत खूब। बहुत खूब, यादव जी।

काम के सिलसिले में समस्तीपुर से सिक्किम जाकर एक साधारण फैक्ट्री वर्कर की बेटी ने जब 10वीं कक्षा में अपनी आंखें खो दीं, तब उसे यूपीएससी का सपना स्पष्ट रूप से दिखने लगा। विजुअल एड्स की उसको जानकारी नहीं थी। यूट्यूब से सेल्फ-स्टडी कर उसने सीएसई की तैयारी ग्रेजुएशन के तुरंत बाद शुरू की। और तीन असफल कोशिशों के बाद जब वो अपने चौथे अटेम्प्ट में मेंस क्लियर कर अपना इंटरव्यू देने जा रही थी, तब उसने मुस्कुरा के अपनी मां से पूछा, “मां, मैं कैसी लग रही हूं?” और उसकी मां का जवाब आया, “बिटिया, तेरे चेहरे पे तेरी खूबसूरती और तेरा आत्मविश्वास दोनों दिख रहे हैं।” क्या इसी आत्मविश्वास के साथ अंजलि शर्मा ने यूपीएससी क्रैक किया?

बिल्कुल जी। उतना अगर आत्मविश्वास नहीं होता, आप इमेजिन करिए कि आप अभी तक बिल्कुल ठीक हैं। आप पूरी दुनिया देख पा रहे हैं। नॉर्मल काम कर रहे हैं। नॉर्मल पढ़ाई कर रहे हैं। और अचानक एक दिन टोटल अंधेरा हो जाता है। टोटल ब्लाइंडनेस — आपको कुछ नहीं दिख रहा। आंख बंद करके सोचिए कि कैसा लगेगा? कैसे आप इवन डे-टू-डे के काम करेंगे? आपको क्या लगेगा जीवन से कि बिल्कुल टोटली निराश, हताश, कुछ नहीं। अब जिंदगी खत्म।

अंजलि शर्मा के साथ ऐसी ही घटना हुई। अंजलि शर्मा समस्तीपुर, बिहार में पैदा हुई। लेकिन सिक्किम में उसके फादर एक फैक्ट्री में मजदूर का ही काम करते हैं। बहुत ही लोअर इकोनॉमिक स्टेटस से है। लेकिन खुश थी कि केंद्रीय विद्यालय में जा रही है। टीचर्स एप्रिशिएट कर रहे हैं। पढ़ाई में अच्छी है। नॉर्मल जो लड़कियां। लेकिन एक दिन उसको अचानक बहुत सिर में दर्द हुआ। बहुत एपिसोड्स फिर पेन के हुए और ब्रेन टीबी बाद में पता चली। उससे उसकी टोटली आंखें चली गईं। 100% ब्लाइंड।

तो क्लास 10th — करीब 15–16 साल की बच्ची है। एक स्टेज था। बहुत दुखी थी। बहुत रोती थी। कहती थी, “मेरी किताबें लाओ, मेरे को पढ़ना है। मैं अपना काम खुद करूंगी।” लेकिन गिर जाती थी। “मैं अब खुद बाथरूम जाऊंगी। खुद कपड़े धोऊंगी।” लेकिन नहीं कर पाती थी। तो बहुत हताश, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।

वह हिम्मत की — “मेरे को पढ़ना है, जाना है स्कूल।” एक साल का गैप हुआ, और वो बच्ची अपने पापा का हाथ पकड़ के, उंगली पकड़ के, वापस केवी में पहुंच गई गंगटोक में। और सुन-सुन के पढ़ाई की। कुछ एड्स का कोई नॉलेज नहीं था। ना कुछ एड्स अवेलेबल थे। सुन-सुन के उसने पढ़ाई की। वापस आती थी अपने घर, तो भाई को या बहन को या पेरेंट्स को बोलती थी कि मेरे को पढ़ के सुना दो लेसन। स्कूल में टीचर से सुनती थी।

जब गेम्स का पीरियड होता था तो दुखी होकर बैठती थी या कुछ-कुछ सोचती थी कि सारे बच्चे खेलने गए, मैं क्या करूं। उसके बाद 11th–12th में टॉप भी किया। भारत सरकार ने भी उसको अवार्ड दिया कि 12th में ऐसी सिचुएशन में स्कूल में टॉप किया आपने। और कॉलेज गई — रेगुलर कॉलेज।

और उसका एक और डिटरमिनेशन था कि मैं कभी स्टिक यूज नहीं करूंगी। मैं ब्रेल नहीं यूज करूंगी। मेरे को नॉर्मल दिखना है क्योंकि नॉर्मल थी शुरू से। कोई और होता जो बाय बर्थ विजुअली हैंडीकैप्ड, ब्लाइंड है, तो वह तो ब्रेल सीखता या सीखती, या स्टिक यूज करना उसको सिखा देते। इसका डिटरमिनेशन था — नहीं। तो बहुत बार गिरी, बहुत बार संभली, बहुत बार चोट खाई। अल्टीमेटली — और बहुत मुश्किल है। अब बच्चे को जो बिल्कुल ब्लाइंड है, कैसे स्कूल जाएगी? उसको बस में बैठा देते थे। कई बार गलत जगह उतर जाती थी। फिर वापस किससे पूछ के बैठती थी। तो यह बहुत था उसको।

लेकिन फाइनली फिर उसको लगा कि मेरे को तो — एक बार जब उसने स्कूल में टॉप किया — तो उसके टीचर ने बोला कि तुम एक दिन जरूर आईएएस ऑफिसर बनोगी। बहुत तुम हिम्मत। तो वह दिमाग में बात घुस जाती है कई बार। हम लोग भी ऐसे ही स्टार्ट — हमारा हुआ कि किसी ने बोल दिया और लगा कि हां भाई, हो तो सकता है। तो इसके साथ भी हुआ कि यही मेरा फॉर्च्यून चेंज होगा।

पर करना कैसे है? तैयारी कैसे करूंगी? इतना सिलेबस पढ़ के कौन सुनाएगा? इतनी जो लंबा-चौड़ा लोग रात-दिन मेहनत करते हैं, दो-दो, तीन-तीन साल पढ़ के, मेरे को कौन पढ़ के सुनाएगा? लेकिन फिर यूट्यूब की हेल्प से उसने पढ़ा।

साथ में बिहार सिविल सर्विस का एग्जाम भी दिया क्योंकि थोड़ा कॉन्फिडेंस कम था कि सीधा यूपीएससी क्रैक कर पाएंगे कि नहीं। और दोनों में सिलेक्शन हुआ। दोनों में। और स्क्राइब की मदद से लिखा।

बहुत बार ऐसा हुआ कि स्क्राइब अच्छा नहीं मिला। पटना सेंटर भर दिया। इंग्लिश मीडियम था। जो बच्चा लिखने के लिए मिला, उसको क्वेश्चन ही नहीं पढ़ना आता था। ऐसी सिचुएशन में बहुत फ्रस्ट्रेटिंग सिचुएशन से गुजरी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। फाइनली सिलेक्शन हुआ। अभी है बिहार काडर भी मिला, बहुत अच्छा है — होम काडर। [प्रशंसा]

यादव जी, 21 साल के एक युवा ने जब आईआईटी-जेईई में ठोकर खाई, एनडीए से उन्हें मुंह मोड़ के वापस आना पड़ा, तब उन्होंने यूपीएससी करने की ठानी। खाने के अकाल के कारण उनका वजन 62 से 52 किलो गिर गया। वित्त संबंधी कठिनाइयों को देख, साहूकारों के चंगुल में फंसे अपने मां-बाप की पीड़ा देख, उन्होंने अपने प्रोफेसरों के ताने सहे। बीमारी-महामारी से लड़ के उन्होंने 14 घंटे दिन में पढ़ाई की और 10वीं रैंक हासिल की सीएसई में। फर्स्ट अटेम्प्ट।

आप बताएं सबको — ये फर्स्ट गांधी ऑफ डिग्री सत्यम गांधी आया कहां से? और ये बटुकदेव कौन था? और एक होने वाले आईएएस ऑफिसर की शर्ट, सूट, पैंट और टाई में उसका क्या योगदान रहा?

देखिए, पहले तो गांधी — सत्यम गांधी — कोई वैसे इसके परिवार का नाम गांधी नहीं है। वह बहुत सीधा बच्चा है। उस समय और सीधा था। बचपन में अपने मामा के घर काफी टाइम रहता था। तो उसकी मामी ने उसको बोला कि देखो, यह बिल्कुल गांधी बाबा जैसा है। यह बिल्कुल मैं जो देती हूं, खा लेता है। करेला भी देती हूं तो हंस के खा लेता है। तो मैं इसको गांधी बुलाती हूं। और उस चक्कर में वह सबसे पहला गांधी बन गया अपने गांव में। गांधी सरनेम उसको बहुत अच्छा लगा।

और बटुकदेव जो है — ऐसे बटुकदेव बहुत सारे गांव में मिल जाते हैं आपको — जो बहुत शोषण करते हैं लोगों का। मैं कहूंगा जो उनकी जरूरतों का फायदा उठाते हैं और 24% या 36% इंटरेस्ट रेट पे वो पैसा देते हैं। और इसके साथ भी यही हुआ सत्यम गांधी के साथ, रोहन।

सत्यम गांधी के पापा बहुत ही नॉर्मल, वहां पे यूनिवर्सिटी में पियोन/असिस्टेंट का काम करते हैं। पूसा एक है — यहां वाला दिल्ली वाला पूसा नहीं है — बिहार में पूसा है, ओरिजिनल वाला पूसा। तो उसमें वहां से उन्होंने लोन लेके इस बच्चे को 12वीं के बाद भेजा।

लेकिन इससे पहले भी इसके साथ एक इंसिडेंट हुआ। ये एनडीए का एग्जाम दिया। रिटन बहुत अच्छे नंबर से पास हुआ। एसएसबी होता है एनडीए के बाद — जो आर्मी में, एयरफोर्स में, नेवी में ऑफिसर बनते हैं — क्लास 12th के बाद। तो यह बच्चा बहुत खुश था जब उसको रिजल्ट सुनाया गया कि एनडीए में वो सिलेक्ट हो गया। एसएसबी में उसने क्लियर कर लिया। बहुत टफ बोर्ड होता है एसएसबी का। 40 में से तीन लोग ने क्लियर किया। और वो 40 वो थे जिन्होंने रिटन अच्छे से पास किया हुआ था।

बहुत खुश था कि अब तो बस मैं घर जाऊंगा, सेलिब्रेट करूंगा, और कुछ दिन बाद ऊपर आसमान में देखता था कि यहां मेरा हवाई जहाज उड़ रहा होगा। लेकिन किस्मत में कुछ और लिखा था। मेडिकल एग्जाम हुआ, और मेडिकल एग्जाम बहुत रिगरस होता है आर्मी में रिक्रूटमेंट के लिए। तो मेडिकल एग्जाम के लास्ट दिन उसको पता चला कि वह तो कलर ब्लाइंड है। और कलर ब्लाइंड इज़ डिसक्वालिफाइड। तो एक बिल्कुल बोल्ट आउट ऑफ द ब्लू उसको लगा। सारे सपने टूट गए।

लेकिन फिर शहीद भगत सिंह कॉलेज, यही दिल्ली में, आया और सोचा कि नहीं, अब मेरे पास एक ही रास्ता है — मेरे को आईएएस ऑफिसर बनना है। वहां कोई कलर ब्लाइंडनेस का इशू नहीं है। तो उसने — और उसको पता था बटुकदेव जो है वो 36% इंटरेस्ट पे पैसा दे रहा है। तो पापा कितने दिन ले पाएंगे? तो उसने सोचा कि मैं तो अर्लिएस्ट ऑपर्च्युनिटी पर मेरे को क्रैक करना है।

सबसे पहले अर्लिएस्ट मैं कब बन सकता हूं? जब मेरे हाथ में डिग्री हो। तो उसने अपने सेकंड ईयर से थोड़ी तैयारी शुरू की। लास्ट ईयर ऑफ कॉलेज — ऐसे बहुत बच्चे आपको मिलेंगे — राजेंद्र नगर, न्यू राजेंद्र नगर आप जाएंगे, छोटे-छोटे कमरे हैं। 10/5 का कमरा है। उसमें एक बेड आता है बस और कुछ नहीं आता। कोई वेंटिलेशन नहीं है। वहां पे वह बच्चा बंद हो गया जाके, और 14 घंटे कम से कम दिन में पढ़ता था। डेली शाम को हिसाब लगाता था कि क्या मैंने एक मिनट भी वेस्ट किया कहीं पे। यह डिटरमिनेशन था। यह जुनून था।

बीच में कोविड भी हुआ। कोविड में बहुत हालत भी खराब हुई। पढ़ाई में लगा रहा। और फर्स्ट अटेम्प्ट में जैसे ही डिग्री खत्म हुई, वैसे ही एकेडमी पहुंच गया आईएएस की ट्रेनिंग के लिए। तो यह उसका डिटरमिनेशन था बच्चे का।

बीच में इतने पैसे नहीं थे कि पूरा तीन टाइम का खाना खाए। तो जो आपने बताया, वेट कम हो गया। तो हाफ टिफिन कुछ मिलता था दो टाइम। तो हाफ टिफिन सर्विस उसने जॉइन की और हाफ टिफिन सर्विस दिन में दो बार खाता था। ब्रेकफास्ट करता नहीं था। तो ऐज़ अ रिज़ल्ट 64 किलो से 52 किलो — 12 किलो — वेट कम भी हुआ एक साल में। लेकिन हिम्मत नहीं टूटी।

हिम्मत ना टूटने और राजेंद्र नगर से मुझे याद आता है एक किस्सा, यादव जी। जुलाई 2016 में कश्मीर में विघटन के कारण स्कूलों और कॉलेजों को बंद रहना पड़ा। इंटरनेट और टेलीफोन शटडाउन से जूझते हुए मोहम्मद यूसुफ भट्ट और रूबी जान के बड़े बेटे वसीम भट्ट ने द हिंदू अखबार पढ़ के यूपीएससी करने की ठानी तो उन्हें कोई रोक ना सका। श्रीनगर से “माउंट यूपीएससी” की चोटी देख वो “सिविल एस्पिरेंट्स” के मक्का, ओल्ड राजेंद्र नगर, नई दिल्ली पहुंचे। मगर महामारी के कारण उन्हें जल्द ही वापस कश्मीर पहुंचना पड़ा। अनंतनाग में उन्होंने कैसे की अपनी यूपीएससी की तैयारी? कैसे सीखा अपनी बहन आरजू से “उर्दू” लहजा, और कैसे उन्होंने 225 रैंक हासिल करने के बाद एक आईआरएस ऑफिसर की पोस्ट छोड़, फिर दोबारा शुरू की आईएएस ऑफिसर बनने की तैयारी।

हम्म जी। एक तो आई मस्ट कॉम्प्लिमेंट यू — आपने बहुत डिटेल में किताब पढ़ी है। एक-एक स्टोरी आपको इतने अच्छे से याद है। थैंक यू वेरी मच।

सो वसीम भट्ट जो है, कश्मीर का बच्चा है, अनंतनाग डिस्ट्रिक्ट। तो बचपन में इंजीनियर बनना चाहता था कि मेरा तो सपना है इंजीनियर बनना है। दोस्तों के साथ बहस होती थी। वॉक करते थे। एक-दूसरे से बातें करते थे। इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचा। वहां जाकर श्रीनगर में उसको लगा कि नहीं, इंजीनियरिंग में मेरा इंटरेस्ट नहीं है। मैं तो चेंज लाना चाहता हूं, और वह चेंज मेरे को आएगा आईएएस ऑफिसर बनके।

दूसरा, उसमें मोटिवेशन के लिए जो दो कश्मीरी ऑफिसर हैं, वो उसके कॉलेज में वैसे आए थे, तो उनकी बातें सुनी। उससे जाना कि क्या होता है सर्विस, कितना क्या रिस्पॉन्सिबिलिटी होती है, क्या ऑपर्च्युनिटीज होती हैं। तो वो उसका और बढ़ता गया — उसका डिटरमिनेशन।

और फिर इसमें एक बहुत इंपॉर्टेंट इंसिडेंट है जो दिखाता है कि फैमिली का कितना बड़ा सपोर्ट जरूरत होती है। जब वसीम की डिग्री खत्म हो गई, अपने गांव आ गया। उस समय सब सोच रहे थे कि अब क्या करेगा। तो उसके मन में था कि आईएएस की तैयारी करनी है, सिविल सर्विस की तैयारी करनी है। एक रात को डिनर टेबल पर बैठे हुए हैं फैमिली, और उसके दोस्त का फोन आता है। वह कहता है कि भाई, मैं तो दिल्ली आ गया हूं और चार दिन बाद कोचिंग शुरू हो रही है। तू भी आजा।

और वसीम — बेचारा — पता है उसको कि पापा मधुमक्खी पालक हैं। पैसा नहीं है, क्या करें? तो वो कहता है, नहीं यार, मैं तो यहीं बैठ के तैयारी करूंगा। तो उतनी बात उसके फादर सुन लेते हैं — मोहम्मद यूसुफ भट्ट — और उसको कहते हैं, बेटा, कुछ नहीं है, जा दिल्ली पहुंच जा। तेरे को क्या चाहिए, मैं अरेंज करूंगा।

उसने बहुत बोला कि नहीं, आपके चार बच्चे, तीन बच्चे और हैं, अभी तो उनका भी ध्यान देना है उनकी एजुकेशन पर। आपने मेरे को इंजीनियर बना दिया, मैं यहीं से करूंगा। लेकिन उसने कहा, नहीं, तुम जाओ। तो दो दिन के अंदर फीस जमा की और उसको दिल्ली भेज दिया। बीच में कोविड हुआ, दूसरी चीजें हुईं, लेकिन इसमें दो-तीन चीजें इंपॉर्टेंट हैं।

एक — उसने कहा कि मैं किसी 10 जगह से गाइडेंस नहीं लूंगा। मैं केवल कोचिंग सेंटर में जो बात बताई जा रही है, उसी पर ध्यान दूंगा। यह बहुत इंपॉर्टेंट है कि यहां-वहां गाइडेंस मत लें। हर जगह आपको चार पंडित मिल जाएंगे जो सिविल सर्विस क्रैक करने के मंत्र बताएंगे। तो इतना कंफ्यूज हो जाओगे। वो नहीं करना चाहिए।

दूसरा — वो नोट्स बहुत अच्छे बनाता था। नोट-मेकिंग इज़ वेरी, वेरी इंपॉर्टेंट। आंसर-राइटिंग प्रैक्टिस इज़ वेरी, वेरी इंपॉर्टेंट।

तो उसने दिल्ली में ही रहा। फर्स्ट अटेम्प्ट में ही प्रीलिम्स हुआ, मेंस हुआ, 245 रैंक आई। इंडियन रेवेन्यू सर्विस में सिलेक्शन हुआ और खूब जश्न हुआ गांव में। गांव में तो चाहे रेवेन्यू सर्विस है, चाहे आईएएस है, सबको लगा बस भाई, आईएएस बन गया बेटा।

लेकिन वसीम को अभी और तैयारी करनी थी, क्योंकि 245 रैंक से उसको 10वां, 9वां, 8वां रैंक लाना था। तो दोबारा प्रीलिम दिया, लेकिन ओवर-कॉन्फिडेंट हो गया। रिजल्ट आने के 7–8 दिन बाद अगला प्रीलिम हो जाता है। तो वह तब जश्न में डूबा था। फिर ओवर-कॉन्फिडेंस था जब वहां पहुंचा कि अरे, मैं तो क्रैक कर चुका हूं। मेरा 245 रैंक आ चुका है। तो सेकंड प्रीलिम में फेल हो गया।

यह बहुत होता है। एक बार बच्चे इंटरव्यू तक जाते हैं, फिर प्रीलिम भी क्लियर नहीं होता क्योंकि ओवर-कॉन्फिडेंस या कोई और कारण। मेहनत कम करते हैं। लेकिन उसने फिर यह नहीं कहा कि चलो प्रीलिम फेल हो गया, अब मैं जाता हूं रेवेन्यू सर्विस जॉइन करता हूं। नहीं। उसने कहा, अच्छा कोई बात नहीं, फेल हो गया। अगली बार मैं टॉप 10 में आऊंगा। तो अगली बार फिर वापस यहां पे आया। दिल्ली आया। यहां पे तैयारी की। यहां पे संगम विहार में एक कोचिंग सेंटर है जो बच्चों को बहुत सस्ते में कोचिंग देता है — जामिया हमदर्द का है। तो हमदर्द वाले में जाकर अपनी तैयारी की, और थर्ड अटेम्प्ट में सेवंथ रैंक उसका रहा। अच्छा, एमपी काडर में अभी है वसीम। आई एम वेरी हैप्पी फॉर हिम।

यादव जी, आज देश भर से बहुत सीनियर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस ऑफिसर हमारे साथ मौजूद हैं। कई लोगों ने यूपीएससी का पेपर लिखा। कई कठिनाई देखी होंगी। मेरा मानना है, अगर हम में से किसी के भी खिलाफ 150 कोर्ट केस दर्ज होते तो हम मुस्कुराते नहीं। मिनू पी. एम. मुस्कुराई थीं। लोकल लीडरों का पॉलिटिकल प्रेशर, लोगों की भीड़, नारेबाजी, पथराव उन्हें इलीगल इंक्रोचमेंट डिमोलिश करने से रोक ना सका। केरल पुलिस के एक जूनियर क्लर्क से आईएएस ऑफिसर तक का सफर उन्होंने तय किया। उनके ट्रांसफर के समय एक बार और लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई — शुक्रिया करने के लिए, उनको विदा करने के लिए, प्रेम से। मुश्किल निर्णय आपने भी जरूर कभी अपनी जिंदगी में लिए होंगे। आप भी इंसाफ के लिए लड़े होंगे। अरुणाचल प्रदेश में आपने स्लेवरी के हित में बात की। कभी आपको भी मजबूरन किसी होम मिनिस्टर के घर में रेड तो नहीं करवानी पड़ी?

आप तो खुद ही लीडिंग क्वेश्चन पूछ रहे हैं। तो जो आपने बात की है, बहुत पुरानी बात है। जब मैं 1999 में, आई वाज़ पोस्टेड एसडीसी, जो डिप्टी कमिश्नर होता है या डीएम होता है, अरुणाचल के एक डिस्ट्रिक्ट में — ईस्ट कामेंग डिस्ट्रिक्ट — तो वहां पहुंचा तो वहां मैंने देखा कि स्लेवरी सिस्टम था वहां पे। एक ट्राइब दूसरी ट्राइब की स्लेव है। और स्लेवरी वाज़ अ स्टेटस सिंबल कि किसके पास कितने स्लेव हैं, वही ज्यादा सोसाइटी में ऊंचा है। तो वहां मैंने 5000 स्लेव्स छुड़वाए, और उसी में एक होम मिनिस्टर वहां के थे, उनके घर में 10 स्लेव थे, जो कि जबरदस्ती पुलिस भेज के — होम मिनिस्टर के घर पुलिस भेज के — स्लेव्स छुड़वाए और उनको रिहैबिलिटेट किया 5000 को।

यादव जी, आखिरी और एक सामाजिक सवाल। हां, हां।

अब वसीम भट्ट ने, श्रुति शर्मा ने तो मिनिस्ट्री ऑफ माइनॉरिटी अफेयर्स, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के द्वारा स्थापित रेजिडेंशियल कोचिंग एकेडमी — जो जामिया यूनिवर्सिटी में है — वहां से गाइडेंस लेके पहली रैंक प्राप्त कर ली। मगर आजकल युवाओं के मन में यह मानना है, या एडवरटाइजिंग से बड़े-बड़े फुल-पेज ऐड में उन्हें एहसास दिलवाया जाता है कि कोचिंग ना मिली तो आप असफल हैं। और कोचिंग लेनी भी है तो सबसे बड़े और सबसे महंगे वाले इंस्टिट्यूट से लेनी है। हम अब बड़े और महंगे इंस्टिट्यूटों का क्या है, यादव जी? वो तो खुद भी डूब रहे हैं और छात्रों को भी डूबा रहे हैं।

तो युवाओं का भविष्य और सुरक्षा मद्देनजर रखते हुए, आपके टाइम पे भी कोचिंग इंस्टिट्यूट हुआ करते होंगे। कोचिंग नहीं लेनी, नहीं लेनी, या लेनी है — इसका निर्णय आपने भी लिया होगा। आप देश के युवा को कुछ मैसेज भेजना चाहेंगे?

मैं कहना चाहूंगा कि देखिए, आईएएस या सिविल सर्विस क्रैक करने के लिए, यूपीएससी — “माउंट यूपीएससी” स्केल करने के लिए — कोचिंग की जरूरत नहीं है। कोचिंग ठीक है, थोड़ा गाइडेंस मिल जाती है, थोड़ा फोकस हो जाता है। लेकिन अगर आप सही तरीके से तैयारी करें, डिटरमाइंड होकर तैयारी करें, तो बिना कोचिंग के बहुत बच्चे सिलेक्ट होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूं। मैंने कभी कोचिंग नहीं ली। मैं हिसार में अपने कॉलेज हॉस्टल में पढ़ता था। वहां कोई कोचिंग नहीं थी। यहां भी नहीं थी। ना मेरे पेरेंट्स अफोर्ड कर सकते।

और इसमें भी आपने देखा होगा, अंजलि ने कोई कोचिंग नहीं ली। लेकिन अंजलि का सिलेक्शन हुआ। और जिन्होंने — एक-दो ने — बच्चों ने कोचिंग भी ली, आप स्टोरी में पढ़ेंगे, उनको भी बाद में लगा कि कोचिंग में बहुत टाइम भी वेस्ट होता है। श्रुति शर्मा की आप स्टोरी पढ़िए। उसको लगा कि यह क्या है? एक बार सेम क्लास में वह दोबारा चली गई तो बहुत ही मैकेनिकल है कि वहीं पर सेम टाइम पर सेम जोक सुनाए जा रहे हैं। जो एक टॉपिक 10 मिनट में कवर हो सकता है, उसमें पूरा घंटा लग रहा है।

तो कोचिंग बहुत सोच-समझ के और बहुत सिलेक्टेड वे में, अगर आपको लेनी है तो भी बहुत सिलेक्टेड वे में लेनी है। नहीं तो बिल्कुल कोचिंग के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। सेल्फ-स्टडी से आजकल गाइडेंस अवेलेबल है। सेल्फ-स्टडी से आप टॉप कर सकते हैं।

यादव जी, जाते-जाते इस किताब पे अगर आपको ऑटोग्राफ मिल जाता है। जी, जी, जी। सो नाइस। सो—

[संगीत]

Participants at the Navigating New Frontiers in Economic Justice and Legal Frameworks

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